
कोरबा, 2 अप्रैल 2026: स्मार्ट सिटी और औद्योगिक नगरी कोरबा में विकास के दावों के बीच एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है— “कहाँ हैं शहर के रैनबसेरे और उनमें ग्रामीणों के लिए कितनी जगह है?” भीषण गर्मी के इस मौसम में दूर-दराज के गांवों से इलाज, कचहरी या बाजार के काम से शहर आने वाले ग्रामीणों के पास सिर छुपाने की कोई पुख्ता जगह नहीं दिख रही है।प्रशासन से सीधे सवाल:शहर के जागरूक नागरिकों और ग्रामीणों ने कलेक्टर महोदय और नगर निगम आयुक्त से कुछ तीखे सवाल पूछे हैं:रैनबसेरों की वर्तमान स्थिति: शहर में बने रैनबसेरों की सूची सार्वजनिक क्यों नहीं है? ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाले मजदूर और किसान रात गुजारने के लिए कहाँ जाएं?निजीकरण का साया: क्या सार्वजनिक रैनबसेरों को भी गुपचुप तरीके से ‘निजी हाथों’ (Private Management) को सौंपा जा रहा है? यदि हाँ, तो क्या वहां अब ग्रामीणों को मुफ्त या रियायती दरों पर सुविधा मिल पाएगी?सुविधाओं का अभाव: जो रैनबसेरे कागजों पर चल रहे हैं, क्या उनमें इस भीषण गर्मी में ठंडे पानी, पंखे और साफ़ बिस्तर की व्यवस्था है?ग्रामीणों की व्यथा:देर शाम काम खत्म होने के बाद बसें छूट जाने पर ग्रामीणों को अक्सर बस स्टैंड के डिवाइडर या दुकानों के बाहर रात काटनी पड़ती है। ग्रामीणों का कहना है कि सरकार ने रैनबसेरे उनके जैसे जरूरतमंदों के लिए बनवाए थे, लेकिन आज वहां का माहौल और प्रबंधन उनके पहुंच से बाहर होता जा रहा है।एक बड़ी चेतावनी:यदि प्रशासन ने समय रहते रैनबसेरों की व्यवस्था दुरुस्त नहीं की और इनकी मॉनिटरिंग निजी स्वार्थों के लिए छोड़ दी, तो गरीब ग्रामीणों का शहर आना और भी दूभर हो जाएगा।”रैनबसेरा किसी का निजी बंगला नहीं, बल्कि आम आदमी का अधिकार है। हम कलेक्टर महोदय से मांग करते हैं कि इनकी जांच हो और ग्रामीणों के लिए अलग से स्पष्ट व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।” — स्थानीय नागरिक समूहन्यूज़ एक्शन डेस्क, कोरबा
